Tuesday, 16 January 2018

AK-004 विलुप्त गोरैया


                    विलुप्त गोरैया

सूंदर प्यारी सबसे न्यारी
चूँ चूँ करती घर आंगन में
फुदक फुदक कर दाना चुगती 
प्यारी प्यारी कोमल सी मेरी गोरैया
हाँ तू तो है मेरी राजदुलारी

भूल गए सब भारत वासी
छोटी सी ये राजदुलारी
याद है हमको ये चिरैया
वक्त कीे धुंदली यादें
छीन ले गए हमसे हमारी
प्यारी प्यारी ये गोरैया

किट पतंगे चुन चुन थी खाती
हरियाली खलिहानों की थी
फसलों की थी रखवाली

घर आंगन अपने में चूँ चूँ का
मीठा सा था राग सुनाती
घर की रौनक कहाँ खो गई
मेरी गोरैया कहाँ खो गई

तुम्हारे कोमल तन को
खत्म किया रसायन के विष ने
पथर के बेजान घरों से
नीड तुम्हारे नष्ट हुए थे
तुम्हारी दशा देख दिल रोता है
आज याद कर नमन करने को
दिल करता है

मानवता के क्रूर हाथों से विल्लप्त हुई तुम 
कहता है आज़ाद पंछी जहां रहो
आबाद रहो तुम मेरी प्यारी राजदुलरी

Poet Ashok (Azad Panchi)

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