Sunday, 21 January 2018

AK-006 सैलाब 22nd Jan. 2018


जंगल में वरिक्षओं के झुंड को निहारा
बरसों से जुड़ी आपस में ऐक जुट हुई
सुदृढ़ मजबूत जड़ों को एक जुट लिपटी
मानो अपनी एकता का प्रतीक चिन्ह

लताएं आपस में गुथम गुत्था सिमटी हुई
बिछुड़ने के एह्सास के डर से लिपटी हुई
एक आपसी प्यार से मानो आलिंगित
अप्रतिम प्यार को दर्शाती संदेश दिया संसार को

ठंडी बयार का हल्का झोंका
शीतलता का एह्सास मनमोहित सा
वक़्त की गति अपनी रफ्तार से बढ़ रही
लुभावना शांत वातावरण शांति शांति

अचानक बयार की गति तेज हुई
पेड़ों की तेज़ आवाज़ आपस में टकराना
मानो साथ खड़ा पेड़ कोई दुश्मन हो
नये पेड धरा से जड़ों को बचाने की कोशिश
मैं उखड़ गये कोशिश नाकाम........

सालों से खडे पेडों की मज़बूत जड़ें संबल बन
आपस में लिपटी येक दुसरे का सहारा बन
उभरी वक़्त के तुफानो से
प्यार ही था उनका संबल गुजरा दौर....
सब शांत हुआ।

बार बार तूफान के थपेड़े कर गए जड़ो की
मज़बूत जड़ों को नरम और खोखला

खोखली पकड़ जड़ों की सैलाब के
तूफ़ानी आक्रोश को झेलने को
नाकाम.......

हर वक़्त नहीं होता ऐसा सैलाब, फिर उमड़ा
सालों पुरानी जड़ें कुछ हिली कुछ मुड़ी
कुछ टूटी सेलाब ले चला जो टूटी कमजोर
जड़ों को कुछ रह गई कुछ और शक्ति समेटे

साथ वाले पेड़ों की पकड़ छुटी
तन्हां हो कर हर हाल में साथ छुटा
सैलाब के साथ बह निकला कहीं और
जड़ों को पकड़ देने नई पहचान नया सफर

कहता है आजाद पंछी हर हाल हर साल नया
नहीं बदला तो पर्मात्मा सिर्फ पर्मात्मा

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