Monday, 1 January 2018

AK 003 ज़िन्दगी का कटु सत्य 1 Jan. 2018


चल उड़ जा रे पंछी के अब ये देस हुआ बेगाना

तूने तिनका तिनका चुनकर नगरी एक बसाई
बारिश में तेरी भीगी पाँखें, धूप में गर्मी खाई
गम ना कर जोे तेरी मेहनत तेरे काम ना आई
अच्छा है कुछ ले जाने से दे कर ही कुछ जाना

भुलजा अब वो मस्त हवा, वो उड़ना डाली डाली
जग की आंख का कांटा बन गई चाल तेरी मतवाली
कौन भला उस बाग को पूछे हो ना जिसका माली
तेरी किस्मत में लिखा है, जीतेजी मार जाना

रोते हैं वो पँख पखेरू, साथ तरे जो खेले
जिनके साथ लगाए तूने अरमानों के मेले
भीगी अखियों से ही उन्की आज दुआएं लेले
किस्को पता अब इस नगरी में कब हो तेरा आना

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